बच्चों की बारात में माता-पिता को बार-बार झेलनी पड़ जाती हैं ये सज़ा

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बच्चों की परवरिश करना कोई आसान काम नहीं है। बच्चे के कोयले मिट्टी के समान होते हैं, जैसे उन्हें ढाला जाता है वो दृश्य ही ढाले जाते हैं। ऐसे में उनके माता-पिता के लिए उनकी समीक्षा काफी संकटपूर्ण है। ऐसे में कई बार वो सिर्फ नंगा ही नहीं बल्कि मेंटली और दुकानें भी बोरियां झेलते हैं। बहुत सारे माता-पिता के बच्चों की मुलाकात में आने वाले इन चुनौतियों पर बात नहीं करते लेकिन लगभग हर के माता-पिता को इन बच्चों की चुनौतियां से रूबरू कराया जाता है।

माता-पिता के मन में अपराध बोध होता है
भागदौड़ भरी जिंदगी, वर्कशॉप लाइफ और एकल परिवार में होने की वजह से मां और पिता दोनों ही बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते। ऐसे में बहुत सारी मांओं को इस बात का गिल्ट मन ही मन रहता है कि वो अपने बच्चे के लिए पर्याप्त समय नहीं निकाल पा रही हैं। ऐसे में वोटली काफी परेशान रहती हैं और बच्चे के प्रति उनके मन में अपराधबोध भरा रहता है।

माँओं को छोड़नी हैं इच्छाएँ
हाउसवाइफ हो या फिर वर्कशॉप वुमन, बच्चों के आ जाने से इतनी काम बढ़ जाती है कि उन्हें अपने शौक और पढ़ाई के लिए समय ही नहीं मिलता। नतीजा वो अपनी पहचान और शौक़ीन दोस्त है। यहां तक ​​कि वो अपनी अलग पहचान ही खोती हैं और बस किसी बच्चे की मां बनकर ही रह जाती है। बच्चों के बड़े होने के बाद एक बार ये मन को काफी ठेस पहुंचाती है।

कपल से अधिकांश माता-पिता रह जाते हैं
यहाँ हर किसी के पास अपना गोल और काम है। इस कारण से उनके पास समय की कमी है। यहां तक ​​कि बच्चा भी जब पढ़ाई करने जाता है तो अपने गोल्स और स्टडी को पूरा करने में बिजी हो जाते हैं। ऐसे में बातचीत, बातचीत और संचार की कमी हो जाती है। इस वजह से कई बार एप्पल में इन दोनों के बीच बहस होती है। सारणीबद्ध रूप से बच्चों को देखना।

समाज उन्नति की सुविधा देता है
सोशल एक्सपेटेन्सी का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर होता है। घर,परिवार,अबैत,रेस्टोरेंट में अक्सर बच्चों की कमी होती है। फिर वो उनकी बिहेवियर हो या फिर खाने की आदत। जिसका सीधा प्रभाव माता-पिता पर पड़ता है और वो काफी हद तक असुविधाजनक महसूस होता है। कि कैसे बच्चे को बिल्कुल परफेक्ट बनाया जाए।

सपोर्ट सिस्टम की कमी
बच्चों की उपलब्धि में बार-बार कमी आने वाले तो घर-परिवार के बहुत सारे लोग मिल जाते हैं। लेकिन पोपली, नाटकीयी या इमोशनली सपोर्ट करने वाले बहुत कम होते हैं। बच्चों की सहायता के लिए समर्थन की कमी काफी कठिन है।

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